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| माँ बहुत परेशान रहती थी |
माँ बहुत परेशान रहती थी
ऐसा नहीं है की मैं उनकी ये वयथा समझता नहीं था मै सब समझता था
पर करता भी क्या
समय ने मुझे कुछ यूँ जकर रखा था
की चाह कर भी में कुछ कर नहीं पा रहा था
मेरी अपनी भी मज़बूरी कुछ अलग ही थी
तभी समय भी सारी सीमा को लाँघ कर मनो कुछ हासिल करना चाह रही थी
खैर घर मे कुछ भी सही नहीं था
वक्त इतना मतलबी होसकती है कभी सोचा तक नहीं था
अगर देखा जाए तो किसे की भी कोई ख़ास गलती थी नहीं
सायद सभी मेरे तरह समय के प्रकोप से जूझ रहे थे
खास कर के पापा वो तो हमेशा से ही ऐसे थे
उनकी तो मज़बूरी थी
जब से मैं पापा बोलने के लायक हुवा
तब से ही मैं ने उन्हें बोझ को ढोता हुवा देखा है
हा मैं ये जनता हु की हर पिता का ये फर्ज होता है
पर क्या किसे पिता के लिए समय इतना बेदर्द भी हो सकता है
सायद वो 14 के भी नहीं थे जब उनके ऊपर बोझ को बिना उनके इजाजत के डाल दिया था
और अब वो 60 के है पर वो बोझ अभी भी वैसे ही है
अगर कुछ बदला है तो सिर्फ वो सिर्फ उस बोझ का आकर जो पहले छोटा था और अब मानो
वही गोबर्धन पहाड़ हो
मै ने कभी नहीं देखा उनको की वो खुश है उनके चेहरा पर कोई भाव नहीं दिखता था
उस चेहरा के पीछे नजाने कितनी सारी ऐसी घटना थी जो हर वक्त घटती रहती होगी वो खुस होते भी
कुछ वजह था नहीं उनके पास
हर वक्त वो जिंदगी के ऐक ऐसी क़िस्त को भरने की कोसिस में रेहते थे
वो हमेशा जीत जाते थे अपने उम्र और छमता को पछाड़ कर पर वो किस्त कभी खत्म नहीं होती थी
वो अब इतना टूट गऐ थे की वो हमारी गलती करने पर हमें टोके भी नहीं थे क्यों की डाटते तो वो पहले भी नहीं थे
फिर उस रात को अचानक से एक अंजान हवा का झोंका मेरे घर के चौखट को लाँघ कर इस तरह से घर में दाखिल हुवा
और सब को तितर - वीतर कर दिया
माँ बहुत परेशान थी जब वो रात की बात मुझे फ़ोन पर बता रही थी
उसने ऐसे किया क्यों बस माँ रो -रो कर यही पूछ रही थी
by मोनू भगत
अगला भाग बहुत जल्द
माँ बहुत परेशान रहती थी पार्ट -02

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