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Tuesday, October 23, 2018

सुयोग्य वर

प्रियंका एक बेहद ही पढ़ी लिखी और खुले विचारों वाली लड़की थी मगर एक मध्यमवर्गीय परिवार में उसके विचारों को समझने वाला कोई नही था। माँ गृहणी थी और पिता जी एक सरकारी स्कूल में क्लर्क।परिवार का माहौल बिल्कुल साधारण था।दुनिया की चमक दमक से दूर। आज के लोगो को जो चाहिये वो है दिखावा। जो उसके परिवार में था नही। पैसे की कीमत क्या होती है प्रियंका भलीभांति जानती थी। घर मे कमाने वाला एक और इतना ख़र्चा फिर भी पापा को कभी परेशान नही देखा था उसने कभी कुछ नही कहते अपने बच्चो से या पत्नी से। आज प्रियंका की शादी के दिन न जाने पापा क्यूँ बहुत परेशान थे सब तो घर के कामो में व्यस्त थे।प्रियंका अपने कमरे से पापा को देख रही थी बार बार घड़ी पर नज़र डाल कर परेशान से हो रहे थे अचानक लैंडलाइन पर फ़ोन आया उधर से प्रियंका के ससुर का फ़ोन था बोल रहे थे कि 5 लाख रुपया तैयार रखना वरना बारात वापिस ले जाएंगे वो। उधर कमरे में दूसरे फ़ोन से ये सब सुन रही थी प्रियंका। आंखों से आंसू बह रहे थे पापा के भी और प्रियंका के भी। कभी पापा को रोते नही देखा था उसने। दिल मे गुस्सा भरा हुआ था । बारात दरवाजे पर थी और उसके ससुर पापा की तरफ इशारे कर के बुला रहे थे। सुधीर जिसकी शादी प्रियंका से हो रही थीं। शायद वो इन सब से अनजान था।
"देखिये समधी जी हमने अपने बेटे को बहुत पढ़ाया लिखा कर इस लायक इसलिए बनाया ताकि उसकी शादी अच्छे से हो और हैसियत नही थी आपकी तो क्यूँ शादी का रिश्ता तय किया ?" सुधीर के पापा तपाक से बोले।
"ओह्ह पापा ! तो आप मुझे बेच रहे है ?"
सुधीर भी कमरे में आ गया।
"ये तो अच्छा हुआ कि प्रियंका ने आप की सारी बाते मुझे बता दी और अंकल इनकी तरफ से माफी मांगता हूं मैं ! क्षमा कीजियेगा। और चलिये यहाँ से फेरो के लिए देर हो रही है। अंकल आप परेशान मत हो अब प्रियंका मेरी जिम्मेदारी है।"
ये सुनकर पापा के चेहरे पर कुछ सुकून दिखा, प्रियंका को पापा की पसन्द पर गर्व भी !


द्वारा लिखित

आकांक्षा पाण्डेय

कहानी का स्रोतhttp://storymirror.com
यह कहानी/कविता /ब्लॉग पर हम कैसी भी प्रकार से कोई हक़ नहीं जताते है अश्ली हक़दार का नाम और उनको डायरेक्टली फॉलो करने का जानकारी हम ने दिया है

जुड़वाँ बहनों का आत्मविश्वास

एक गाँव में दो जुडवाँ बहनें रहती थी। वे दोनों बिल्कुल अनाथ थीं। गाँव वालों ने ही उनका पालन-पोषण किया। जैसे-जैसे वे बड़ी होने लगी तो उन्हें दूसरों से लेकर खाना बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था। दोनों ने मिलकर लोगों के घर में काम करना आरंभ कर दिया। इस प्रकार लोगों ने उन्हें पैसे, कपड़े, भोजन आदि देकर उनकी सहायता भी की और उनके आत्मसम्मान को भी बनाए रखा।
धीरे-धीरे दोनों बहनें काम करने में इतनी चुस्त हो गई कि अब वे सिलाई-कढ़ाई भी करने लगी। गाँव के सभी लोग उनसे ही अपने कपड़े सिलवाते। दोनों बहनों की लगन, मेहनत व आत्मविश्वास ने बहुत जल्दी ही उन्हें धन-दौलत से परिपूर्ण कर दिया। मेहनत की कमाई हुई दौलत से उन्होंने एक सिलाई-सैंटर खोला और अपने ही गाँव की बहनों को अपने साथ काम सिखाया। अब उनके साथ अन्य ग्रामीण महिलाएँ भी थी। इस प्रकार उन दो अनाथ जुडवाँ बहनों ने हिम्मत न हार कर अपने ही गाँव में एक ऐसी मिसाल कायम की, जो भारत देश की हर बेटी को सिर ऊँचा करके समाज में जीने हेतु प्रेरित करती है।
उनके इस अथाह परिश्रम से हम सबको भी समाज में मिलकर रहने व एक-दूसरे की निस्वार्थ भाव से सेवा करने की प्रेरणा मिलती है। सच है कि ‘‘ स्वयं में हो यदि आत्मविश्वास ! पूर्ण होती है हर एक आस !’’


द्वारा लिखित


कहानी का स्रोतhttp://storymirror.com
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अर्धांगिनी


अर्धांगिनी/wife
                                   
अपने कार्यालय के वातानुकूलित कक्ष मे बेठै सतीश की दृष्टि मेज पर रखे आमन्त्रण पत्र पर पड़ी। उसकी पत्नी मीरा अपना निजी व्यापार आरम्भ करने वाली थी, जिसका उद्घाटान इस सोमवार को था। वह आमंत्रण पत्र उसी समारोह का था। मीरा और सतीश जिन परिवारो में पले-बढ़े वे एक-दूसरे से पूरी तरह से भिन्न थे। सतीश के परिवार के मुखिया यानि कि उसके पिता ने अपनी संतानो पर कईं तरह की बन्दिशे लगा रखी थी। उन्हे कोई भी निर्णय स्वयं लेने की छूठ नहीं थी। उन के जीवन से सम्बन्धित किसी भी बात पर, चाहे बात उन की शिक्षा की हो या विवाह की; निर्णय लेने का अधिकार सिर्फ पिताजी को ही था। जब कि मीरा के माता पिता ने उसे हर तरह की छूठ दे रखी थी। मीरा के पिता का वस्त्रों का व्यापार था। व्यापार मे हानि होने के कारण परिवार की आर्थिक दशा खराब हो गयी। सतीश का परिवार सम्पन्न था एवम् उसके सभी रिश्तेदार सरकारी कार्यालयों मे उच्च पदो पर सुशोभित थे। इसी कारण जब मीरा विवाह के पश्चात सतीश के घर आयी तो उसे कुछ खास सम्मान न मिला। पर मीरा में वो गुण थे जो एक आदर्श भारतीय नारी के लिए अनिवार्य थे- सहनशीलता, क्षमा और धैर्य। उसने हर अपमान को सहन कर लिया पर परिवार में किसी के लिए भी मन में मैल न रखा। वह अपने पिता कि व्यापार मे हुई पराजय को अपने कठिन परिश्रम से विजय मे बदलना चाहती थी। श्री धीरूभाई अम्बानी उसके आदर्श थे और वह भी उनकी तरह वाणिज्य की दुनिया मे सफ़लता के शिखर छूना चाहती थी।
अचानक सतीश को उन की शादी की वो पहली रात याद आ गयी। जब सतीश अपने कक्ष मे पहुँचा तो दुल्हन के वस्त्रो मे पंलग पर बैठी मीरा उसकी ड़ायरी पढ़ रही थी। वही ड़ायरी जिस मे वह कथाऐं लिखा करता था जब वह दसवीं कक्षा मे था।
"मुझे नही पता था कि मेरे पतिदेव एक लेखक भी है।" सतीश को देख मीरा ने पंलग से उठते हुए कहा।
"तुम्हें ये ड़ायरी कहाँ से मिली?"
"यहीं आपकी अलमारी मे रखी हुई थी।"
"उसे वापस वहीं रख दो। कहीं पापाजी ने देख लिया तो उन्हें अच्छा नहीं लगेगा।"
"पर ये कहानियाँ तो बहुत अच्छी हें, फ़िर वे क्यों नही पसंद करेंगे?"
"मुझे आज भी वो दिन अच्छी तरह से याद है जब मैं दसवीं कक्षा में था और मुझे कथा रचना प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त हुआ था। मैंने घर आकर ये बात बड़े हि हर्ष के साथ पापाजी को बतायीं तो उन्होने कहा- अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो सतीश और एक अच्छी नौकरी प्राप्त करने का प्रयास करो। तो ही तुम्हें जीवन मे सफल बन सकोगे। चन्द कागज़ों पर कलम चला कर जीवन निर्वाह के लिए धन कमा सकोगे? भविष्य में अपने परिवार का पालन पोषण कर सकोगे? हमारे परिवार के अन्य सदस्यों की तरह सम्मान के पात्र बन सकोगे? ये सब कर के क्या मिलेगा तुम्हें? तुम्हारी रचनायें कुछ पत्र-पत्रिकाओं में छप गईं तब भी एक परिवार का निर्वाह तो न हो पाएगा।"
सतीश ने सिर झुका कर कहा, "बस फिर उसी दिन मैंने पापाजी को वचन दिया कि मैं उनका स्वप्न साकार कर के दिखाउंगा। उसके बाद मैं सिविल सर्विस की पढ़ाई मे जुट गया। मैंने इस ड़ायरी को फिर कभी मुड़ कर नहीं देखा।"
"आप हत्यारे हैं सतीश!"
मीरा की ये बात सुन कर वह दंग रह गया।
"आपने अपने अंदर के लेखक को मार ड़ाला।"आँखों में आँसू भर कर मीरा ने कहा।
सतीश ने एक ठण्डी आह भरी और सोचा- शायद मीरा सच ही कह रही थी। अब वह अपने आप को ही पहचान नहीं पा रहा था। अब कोई और बन चुका था वह। शायद उसकी आत्मा का एक अंश मृत हो चुका था।
सतीश ने आमन्त्रण पत्र को खोल कर पढ़ा और वापस मेज़ पर रख दिया। वह मीरा को घर-खर्च के लिए जो रूपए दिया करता था उसमे से वह तिनका-तिनका जोड़ कर अपने व्यापार के लिए पूँजी जमा करती रही। और फिर जब एक छोटी रकम जमा हो गयी तो उसने अपनी जान पहचान की कुछ महिलाओं के साथ मिल कर अचार बनाना और बेचना शुरू कर दिया। उसके बनाए अचार के सब कायल थे। धीरे-धीरे जब व्यापार बढ़ा तो उसने अपना छोटा-सा कार्यालय भी खोल लिया। और आने वाले सोमवार को उसकी फैक्ट्री का उद्घाटन है। सचमुच अपने दृढ़-निश्चय और अथक परिश्रम के बल पर उसने अपने पिता की हार को जीत में बदल दिया।
सतीश को अपनी पत्नी पर बड़ा गर्व महसूस हुआ। वह उठा और उसने अपने आप को दर्पण मे देखा। पर उसे उस दर्पण में एक कलेक्टर नहीं बल्कि एक हत्यारा नज़र आया। उसकी आत्मा ने उसे दुत्कार कर कहा, "मीरा बहुत ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं है। उसके पास आय का कोई मार्ग भी नहीं था। फिर भी अपने दृढ़-संकल्प के बल पर उसने अपना-सपना पूरा कर लिया। और तुम... तुम कायर हो सतीश। असफलता के डर से तुम ने अपना मार्ग ही बदल लिया। अपने जीवन की सबसे बड़ी आकांक्षा से मुँह मोड़ लिया! तुम्हें लज्जा नहीं आती अपने-आप को मीरा का पति बताते हुए?"
सतीश ने अपनी आँखें कस कर बन्द कर ली। कुछ क्षण पश्चात उसने अपनी आँखें खोली और खोलते ही एक बार फ़िर से कागज़ और कलम उठा लिया। आज बहुत दिनों बाद उसने पहली बार जो लिखा वो अपना इस्तीफा था। इस्तीफा-अपने पिता की, अपने परिवार और समाज की महत्वाकाक्षाओं से, जो वर्षों से उसकी आत्मा पर बोझ बन कर पड़ी हुई थी। इस्तीफा देकर वह सीधे घर गया और अपनी ड़ायरी उठा ली। उसके मन में एक अजीब-सी प्रसन्नता थी जैसै वर्षों से मृत पड़े उसके शरीर के किसी अंग में प्राण वापस आ गए हों। अपनी ड़ायरी के पहले पृष्ठ पर उसने लिखा-
समर्पित - मेरी अर्धांगिनी मीरा को
जो सच्चे अर्थो में मेरी अर्धांगिनी है। जिसकी प्रेरणा से मेरे शरीर के उस अर्धांग में प्राण लोट आए जो वर्षों से मृतप्राय था। वह मेरी इस रचना की प्रेरणा-स्त्रोत है। उसने ही मेरे अंदर के लेखक को पुर्नजीवित किया है। अगर वह मेरी अर्धांगिनी बन मेरे जीवन में न आती तो मैं जीवन भर स्वयं अपनी ही हत्या के पाप का बोझ ढ़ोने पर विवश हो जाता। परन्तु उसकी प्रेरणा ने मेरे निर्वाण का मार्ग प्रदर्शित कर दिया।


द्वारा लिखित


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इटली का एक मित्र

मैं पेशे से एक मरीन इंजिनियर हूँ | दिसंबर १९७७ में बतौर जूनियर इंजिनियर मैंने अपने कैरियर की शुरुआत भारतीय नौवहन निगम के जहाज “ननकोरी” पर की | अपने काम की वजह से मुझे हमेशा जहाज पर ही रहना पड़ता था और जहाज के साथ साथ एक बंदरगाह से दूसरे तक जाना पड़ता था | उन दिनों १२ महीने जहाज पर काम करने के बाद एक महीने की छुट्टी मिलती थी | १९८० में मेरी शादी हुई, पहली बेटी का जन्म फरवरी १९८४ में, नवंबर १९८५ में दूसरी बेटी और जून १९९० में बेटे का जन्म हुआ | आर्थिक मजबूरियों के चलते शुरू के कुछ साल नौकरी छोड़ना मुमकिन नहीं था | लेकिन अपनी पत्नी और बच्चों की मुझे बहुत याद आती थी | खासकर मैं अपने बच्चों का बचपन और उनका बढ़ना बहुत मिस करता था | यही वजह थी कि १९९२ में मैंने जहाज की नौकरी छोड़ने की ठान ली |

सन १९९२ में, मैं स्टीम टर्बाइन संचालित टैंकर “अल्की” नाम के जहाज पर चीफ इंजिनियर था | मेरा जहाज दुबई के एक रिपेयर यार्ड, दुबई ड्राईडॉक्स (नया नाम ड्राइडॉक्स वर्ल्ड) में मरम्मत के लिये लाया गया | उन दिनों हमारे जहाज के इंजिनियर सुपरिन्टेन्डेन्ट श्री मोस्किनी, जो इटालियन मूल के थे, जहाज की मरम्मत के लिए दुबई आए हुए थे | इसके अलावा, मरम्मत के बाद, जहाज के तकनीकी प्रबंधन का नियंत्रण भी एक दूसरी कंपनी को सौंपा जाना था । मैं मोस्किनी साहब को पिछले ४–५ वर्षों से अच्छी तरह से जानता था, लेकिन केवल एक इंजिनियर सुपरिन्टेन्डेन्ट के रूप में । मुझे कभी उनके साथ मिलकर काम करने का मौका नहीं मिला । लेकिन अल्की पर मुख्य अभियंता के रूप में कार्य काल के दौरान, मेरे और उनके बीच सम्बंध काफी गहरे और दोस्ताना बन गये |

एक दिन चाय पर चर्चा के दौरान, मैंने मोस्किनी साहिब को बताया कि अल्की मेरा आखिरी जहाज होने जा रहा है | अब आगे और सेल करना मुमकिन नहीं होगा | इसके बाद मैं किनारे पर ही कोई काम करने की सोच रहा हूँ | उनको मैंने अपनी दुविधा बताई और साथ ही मैंने इस सन्दर्भ में उनकी मदद भी मांगी | तुरंत ही उन्होंने अपने कुछ संपर्कों को फोन घुमाये और फिर बोले, शाम ५ बजे बायो डाटा के साथ तैयार रहना | उसी दिन शाम को मोस्किनी साहिब मुझे एक सर्वे कम्पनी के ऑफिस में मिलाने लेकर गये | लेकिन चीफ सर्वेयर से मिलकर पता चला कि उन दिनों वहां कोई जगह खाली नहीं थी | फिर भी उन्होंने भविष्य का वादा कर मेरा बायो डाटा रख लिया |

अगले दिन मोस्किनी साहिब सुबह ८ बजे जहाज पर आये | आते ही बोले, आजकल दुबई ड्राईडॉक्स का विस्तार चल रहा है | तुम एक बात बताओ, तुम्हारा झुकाव टेक्निकल में है या कमर्शियल में है | शिपयार्ड में दोनों विभागों में ही जगह खाली हैं | मैंने उनको बताया कि मुझे दोनों विभागों में ही कोई दिक्कत नहीं है फिर भी अगर हो सके तो मैं कमर्शियल को प्राथमिकता दूंगा | मोस्किनी साहिब ने तुरंत ही कमर्शियल विभाग में अपने किसी सम्पर्क को फोन घुमाया और मेरे बारे में बात की | फोन ख़त्म करने के बाद बोले, शिपयार्ड के कमर्शियल विभाग में मेरे एक बहुत अच्छे मित्र हैं और वो तुमसे आज शाम ४ बजे मिलना चाहते हैं | शाम ४ बजे हम दोनों ड्राईडॉक्स के कमर्शियल विभाग के ऑफिस पहुंचे | जहाँ पहले कमर्शियल मैनेजर से १५-२० मिनिट बातचीत हुई और फिर कमर्शियल डायरेक्टर से मुलाकात हुई | इन दो मुलाकातों के बाद मुझे नौकरी का प्रस्ताव दे दिया गया |

उस शाम मैंने अपनी पत्नी को फोन पर बताया कि अपने जहाज के इटालियन मित्र की मेहरबानी से मेरा वनवास ख़त्म होने जा रहा है | मुझे शिपयार्ड में नौकरी मिल गई है | अब तुम भी अपनी तैयारियां कर लो | १ महीने बाद से हम सब दुबई में साथ २ रहेंगे | और हाँ, शादी के १२ साल बाद, इस बार दिवाली पर हमारा पूरा परिवार एक साथ होगा।

द्वारा लिखित
Yogesh Goyal "Yogi" 
कहानी का स्रोतhttp://storymirror.com
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